What is antimicrobial resistance (रोगाणुरोधी प्रतिरोध) ?
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रोगाणुरोधी प्रतिरोध  (antimicrobial resistance) क्या है ?

हमारे शरीर विभिन्न प्रकार के कोशिकाओं, विटामिन, वसा , प्रोटीन, लवणों, अम्लों एंजाइमों के अतिरिक्त अन्य रसायनों और खनिज पदार्थो के अद्भुत संयोग से बना होता है।  स्वस्थ शरीर में इन सभी की  एक निश्चित मात्रा के अनुपात की जरूरत रहती है जो शरीर के वजन, लम्बाई और जीवन शैली के अनुसार थोड़ी काम या अधिक हो सकता है इसलिए प्रत्येक प्रकार के अवयवों (Components) की एक विस्तार (Range) चिकित्सीय वैज्ञानिकों के द्वारा निर्धरित की गई है। ये सभी प्रकार के अवयव प्रशन्नता पूर्वक हमारे शरीर को प्राप्त भोज्य पदार्थों, जल और वातावरण से लिए गए ऑक्सीजन की मदद से उपापचयी क्रियाओं (Metabolic activity) के द्वारा दैनिक उपयोग की ऊर्जा प्रदान करते है।

जब शरीर में भोज्य पदार्थों में संतुलन नहीं होता तो किसी एक या अधिक प्रकार के अम्लों या लवणों की अधिकता या कमी हो जाता है ,जिसके कारण हमारे शरीर का आंतरिक पारिस्थितिक तंत्र (Internal ecosystem) बिगड़ जाता है तो इसे ठीक करने के लिए दवा के रूप में पूरक खाद्य सामग्री (Food suppliments) देकर ठीक किया जाता है।

एक दूसरा कारण है जिसमें शरीर में बाहर से जीवाणु (वायरस ,वेक्टेरिया ,परजीवी इत्यादि ) भोज्य पदार्थो, जल और वातावरण से श्वशन (सांसो) के जरिये शरीर में प्रवेश कर जाते है और ये शरीर के आंतरिक परितंत्र को अस्त व्यस्त करने का प्रयास करते है। जीवाणुओं के इस प्रयास के खिलाफ हमारे शरीर में पहले से उपस्थित लगभग उसी प्रकार के जीवाणुओं का समूह जो प्रतिरक्षी प्रणाली विकसित करते है , उनसे लड़ने का काम करता है। अब लड़ाई में यदि प्रतिरक्षी प्रणाली के जीवाणु ज्यादा ताकतवर हो तो बाहर से आये जीवाणुओं का काम तमाम कर देते है। और हमारा शरीर स्वस्थ ही रहता है और अमूमन हमे पता भी नहीं चलता। लेकिन इसी बहार से आए जीवाणु ज्यादा ताकतवर निकले तो प्रतिरक्षी प्रणाली को हानि पहुंचाते है जिससे शरीर बीमार हो जाता है। समय के साथ ये ज्यादा ताकतवर होते जाते है और प्रतिरक्षी प्रणाली को पूरी तरह से वर्बाद कर देते है। यदि समय रहते इनको मारा नहीं जाता (इलाज) तो जीव की मृत्यु हो सकता है।

आपने एक कहावत अवश्य सुनी होगी “लोहा लोहे को काटता है ” उसी प्रकार हमारे शरीर में यदि वायरस का संक्रमण हो जाए तो उससे लड़ने के लिए उसी प्रजाति का एक दूसरा वायरस (viruses) जिसे एंटीवायरल ( antivirals) कहा जाता है शरीर में प्रवेश कराया जाता है वह चाहे इंजेक्शन के माध्यम से हो या कैप्सूल अथवा टैबलेट के रूप में। ठीक उसी प्रकार बैक्टीरिया (Bacteria) जनित रोगों के लिए एंटीबायोटिक्स (antibiotics), फफूंद या कवक (fungi) से उत्पन्न रोगों के लिए  एंटीफंगल (antifungals) और परजीवी (parasites) से जनित रोगों के लिए एंटीमलेरियल और एंटीहेल्मिंटिक्स (antimalarials and anthelmintics) इत्यादि दिए जाते है। ये सभी प्रकार की रोगाणुरोधी दवाएं हमारे शरीर की रोगाणुरोधी क्षमता को तत्काल प्रभाव से मजबूत कर बाहर से आए सूक्ष्मजीवों (microbes) को मार डालते है। लेकिन इनका प्रभाव शरीर में कुछ समय तक बना रहता है। जिससे शरीर के अन्य अंग भी प्रभावित (Side effects ) हो सकते है।

 इस प्रकार के दवाओं का अत्यधिक  या बार बार सेवन से शरीर में जब ये दवाएं फिर कभी जरूरत पड़ने पर दिया जाता है तो उसके सकारात्मक नतीजे नहीं मिलते है। जिसके कारण इस प्रकार की दवाओं की खुराक बढ़ानी पड़ती है या उसकी मात्रा में वृद्धि (Power) करना पड़ता है। एक समय ऐसा आता है जब ये दवाएं कारगर साबित नहीं होती है। ऐसा दो करणों से प्रायः होता है : एक शरीर इन दवाओं के प्रति कोई प्रतिक्रिया करना बंद कर देता है। दूसरा सूक्ष्मजीवी अपने में संवर्धन कर इन दवाओं के प्रति अपने में प्रतिरोधी क्षमता विकसित कर लेते है।  

रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial resistance) तब होता है जब सूक्ष्मजीव (जैसे बैक्टीरिया, कवक, वायरस और परजीवी) रोगाणुरोधी दवाओं (जैसे एंटीबायोटिक्स, एंटीफंगल, एंटीवायरल, एंटीमाइरियल और एंटीहेल्मिंटिक्स) के संपर्क में आने पर बदल जाते हैं। रोगाणुरोधी प्रतिरोध विकसित करने वाले सूक्ष्मजीवों को कभी-कभी “सुपरबग (Superbugs)” कहा जाता है। नतीजतन, दवाएं अप्रभावी हो जाती हैं और शरीर में संक्रमण बना रहता है, जिससे दूसरों में फैलने का खतरा बढ़ जाता है।

रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial resistance) स्वाभाविक रूप से समय के साथ होता है, आमतौर पर आनुवंशिक परिवर्तनों (genetic changes) के माध्यम से। हालांकि, एंटीमाइक्रोबायल्स (antimicrobials) का दुरुपयोग और अति प्रयोग (misuse and overuse) इस प्रक्रिया को तेज कर रहा है। कई जगहों पर, लोगों और जानवरों में एंटीबायोटिक दवाओं का अत्यधिक उपयोग और दुरुपयोग किया जाता है  और अक्सर पेशेवर निरीक्षण के बिना दिया जाता है। लोग डॉक्टरों की सलाह के बिना ही एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग करने लगे है।  सर्दी और फ्लू जैसे वायरल संक्रमण वाले लोगों के द्वारा एंटीबायोटिक दवाओं लिया जाता है जबकि यह अनुचित है। क्योंकि सर्दी जुकाम वायरस के कारण फैलने वाला रोग है जिसमे एंटीवायरल दवाओं का सेवन करना चाहिए न कि एंटीबायोटिक्स का। इसलिए डॉक्टर के बिना सलाह के एंटीबायोटिक्स दवाओं को नहीं लेना चाहिए यह उन दवाओं के प्रति शरीर में न केवल प्रतिरोघ उत्पन्न कर देगा बल्कि इसके शरीर पर दुष्प्रभाव भी हो सकते है।

अभी कोरोना महामारी में लोग बिना डॉक्टर के सलाह के कई तरह के एंटीबायोटिक्स जैसे एजिथ्रोमाइसिन ( Azithromycin) , Ciplox 500 जैसे दवाइयाँ लोग स्वयं ही खरीदकर लेने लगे है। ये दवाएं बैक्टीरिया को मरता है न की वायरस को। इसी तरह शुरुआती दिनों में लोग क्लोरोक्विन (Chloroquine) लेने लगे थे जो कि एंटी मलेरियल दवा है जो मलेरिआ परजीवी को मारता है न कि वायरस को। यदि इन दवाओं को डॉक्टर देते भी है तो उसके कई कारण हो सकते है। स्वयं इन दवाओं को निवारक उपाय (preventive measures) के रूप में कभी नहीं लेना चाहिए।

आजकल ज्यादा मुनाफा कमाने और तीव्र वृद्धि के लिए उत्पादक जानवरों और मछलियों को एंटीबायोटिक्स प्रमोटर के रूप में देने लगे है। ऐसी जानवरों और मछलियों के खाने से हमारा  शरीर भी  रोगाणुरोधी प्रतिरोधी (Antimicrobial resistant) हो जाता है। इसी प्रकार फलों और सब्जियों में एंटी फंगल दवाओं का छिड़काव भी हमारे शरीर में अप्रत्यक्ष रूप से रोगाणुरोधी प्रतिरोधी (AMR) क्षमता को प्रभावित करता है। 

रोगाणुरोधी प्रतिरोधी रोगाणु लोगों, जानवरों, भोजन और पर्यावरण (पानी, मिट्टी और हवा में) में पाए जाते हैं। वे लोगों और जानवरों के बीच और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में फैल सकते हैं। खराब संक्रमण नियंत्रण, अपर्याप्त स्वच्छता की स्थिति और अनुचित भोजन-प्रबंधन रोगाणुरोधी प्रतिरोध के प्रसार को प्रोत्साहित करते हैं। रोगाणुरोधी की उपस्थिति में, रोगाणु या तो मारे जाते हैं या, यदि उनमें प्रतिरोध जीन होते हैं, तो वे जीवित रहते हैं। ये बचे हुए सूक्ष्म जीव अपने जीन में परिवर्तन करके संवर्धन (Replicate) करते है और अपनी संख्या बढ़ाते जाते है।

रोगाणुरोधी प्रतिरोधी (AMR ) वैश्विक चिंता का विषय क्यों है?

  • विश्व स्तर पर नए प्रतिरोध तंत्र उभर रहे हैं और फैल रहे हैं, जिससे आम संक्रामक रोगों के इलाज की हमारी क्षमता को खतरा है, जिसके परिणामस्वरूप लंबी बीमारी, विकलांगता और मृत्यु हो सकती है।
  • संक्रमण की रोकथाम और उपचार के लिए प्रभावी रोगाणुरोधी दवाओं के बिना, अंग प्रत्यारोपण, कैंसर कीमोथेरेपी, मधुमेह प्रबंधन और प्रमुख सर्जरी (उदाहरण के लिए, सीजेरियन सेक्शन या हिप रिप्लेसमेंट) जैसी चिकित्सा प्रक्रियाएं बहुत अधिक जोखिम वाली हो जाती हैं।
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध अस्पतालों में लंबे समय तक रहने और अधिक गहन देखभाल की आवश्यकता के साथ स्वास्थ्य देखभाल की लागत को बढ़ाता है।
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध सहस्राब्दी विकास लक्ष्यों के लाभ को खतरे में डाल रहा है और सतत विकास लक्ष्यों की उपलब्धि को खतरे में डाल रहा है।
  • अधिकांश रोगाणु हर कुछ घंटों में विभाजित करके प्रजनन (reproduce) करते हैं, जिससे वे तेजी से विकसित (evolve rapidly) होते हैं और नई पर्यावरणीय परिस्थितियों (new environmental conditions) के लिए जल्दी से अनुकूलित (adapt quickly) होते हैं। प्रतिकृति (replication) के दौरान, उत्परिवर्तन (mutations) उत्पन्न होते हैं और इनमें से कुछ उत्परिवर्तन (mutations) एक व्यक्तिगत सूक्ष्म जीव को एक रोगाणुरोधी के संपर्क में जीवित (survive) रहने में मदद कर सकते हैं।
  • सूक्ष्मजीव भी एक दूसरे से जीन प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें ऐसे जीन भी शामिल हैं जो सूक्ष्म जीव को दवा प्रतिरोधी बनाते हैं। बैक्टीरिया अरबों में अपनी संख्या वृद्धि करते हैं। जिन जीवाणुओं में दवा प्रतिरोधी डीएनए (DNA) होता है, वे इन जीनों की एक प्रति अन्य जीवाणुओं में स्थानांतरित कर सकते हैं। गैर-प्रतिरोधी बैक्टीरिया (Non-resistant bacteria) नया डीएनए प्राप्त करते हैं और दवाओं के प्रतिरोधी बन जाते हैं। दवाओं की उपस्थिति में, केवल दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया ही जीवित रहते हैं। दवा प्रतिरोधी बैक्टीरिया कई गुणा होकर पनपते हैं।

रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR ) पर वैश्विक  रुझान:

  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial resistance) बैक्टीरिया, परजीवी, वायरस और कवक के कारण होने वाले संक्रमणों की लगातार बढ़ती हुई श्रेणी की प्रभावी रोकथाम और उपचार के लिए खतरा है।
  • रोगाणुरोधी प्रतिरोध (AMR ) वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा है जिसके लिए सभी सरकारी क्षेत्रों और समाज में कार्रवाई की आवश्यकता है।
  • प्रभावी एंटीबायोटिक दवाओं के बिना, प्रमुख सर्जरी और कैंसर कीमोथेरेपी की सफलता से समझौता किया जाएगा।
  • बीमारी की लंबी अवधि, अतिरिक्त परीक्षण और अधिक महंगी दवाओं के उपयोग के कारण प्रतिरोधी संक्रमण वाले रोगियों के लिए स्वास्थ्य देखभाल की लागत गैर-प्रतिरोधी संक्रमण वाले रोगियों की देखभाल की तुलना में अधिक है।
  • विश्व स्तर पर, 3.8 % लोग हर साल बहु-दवा प्रतिरोधी (multi-drug resistant) टीबी विकसित करते हैं, और दवा प्रतिरोध एचआईवी और मलेरिया के खिलाफ लड़ाई को भी जटिल करना शुरू कर रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के पिछली रिपोर्ट केअनुसार भारत में 2.8 % लोग हर साल बहु-दवा प्रतिरोधी (multi-drug resistant) टीबी विकसित करते हैं, अर्थात 1000 में लगभग 30 लोगों में बहु-दवा प्रतिरोधी (multi-drug resistant) टीबी विकसित हो चुका है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में हर साल कम से कम 2 मिलियन लोग एंटीबायोटिक प्रतिरोधी बैक्टीरिया से संक्रमित हो जाते हैं और इन संक्रमणों के प्रत्यक्ष परिणाम के रूप में कम से कम 23,000 लोग मर जाते हैं। जबकि भारत में 7 लाख से अधिक लोग प्रतिवर्ष इसके कारण जान गवां देते है।

 भारत में रुझान (Key trends in India)

सामान्य आबादी के लिए प्रतिरोध के समग्र बोझ का आकलन करना कठिन है, लेकिन संभवतः नवजात शिशुओं और बुजुर्गों पर ध्यान केंद्रित किया जाता है, दोनों में संक्रमण का खतरा अधिक होता है और अप्रभावी उपचार की चपेट में आते हैं।

 हालांकि प्रतिरोध के समग्र बोझ का सटीक अनुमान उपलब्ध नहीं है, यह अनुमान है कि हर साल पहली पंक्ति के एंटीबायोटिक दवाओं के दवा-प्रतिरोध के कारण होने वाली सेप्सिस के कारण 58,000 नवजात मौतें होती हैं।

एंटीबायोटिक का उपयोग प्रतिरोध का एक प्रमुख चालक है। 2010 में, भारत मानव स्वास्थ्य के लिए एंटीबायोटिक दवाओं का दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता था। सरकार के प्रयासों से इसमें कमी आयी है और थोड़े लोग जागरूक हुआ है। अभी मंगोलिया सबसे बड़ा उपभोक्ता है।

एंटीबायोटिक दवाओं तक पहुंच बढ़ रही है, जो भारत की आबादी के बड़े हिस्से के लिए अच्छी तरह से दर्शाती है, जिसकी अब तक इन जीवन रक्षक दवाओं तक खराब पहुंच है।

खराब सार्वजनिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे, बढ़ती आय, बीमारी का एक उच्च बोझ, और एंटीबायोटिक दवाओं की सस्ती, अनियमित बिक्री जैसे कारकों ने भारत में प्रतिरोधी संक्रमणों में तेजी से वृद्धि के लिए आदर्श स्थिति बनाई है।

दवा के दुकानों से सीधे बिना पर्ची के दवा खरीदने का चलन भारत में दुनिया में सबसे अधिक है।  इसलिए दवा उत्पादन और बिक्री के नियमन में सुधार करना, चिकित्सक मुआवजे का बेहतर प्रबंधन और डॉक्टरों और रोगियों के बीच व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करना सरकार की तत्काल प्राथमिकता है।

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