IAS Lecture Series : Indian Economy

 

पिछले दिनों मेरे एक मित्र ने अपने यहाँ बच्चे के जन्म दिन की योजना बनाया, उन्होंने सभी प्रकार के खर्चो का हिसाब लगाया और उसके अनुसार एक बजट बनाया| उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम 25  हजार रूपये तो आगन्तुक और सगे सम्बन्धी दे देंगे और उनके पास एक लाख रूपये है अतः उन्होंने 1.25  लाख का बजट बनाया और टेंट और केटरिंग का सुंदर प्रबंध किया परन्तु अंतिम समय में कुछ सामान उम्मीद से ज्यादा महंगे मिले और कुछ अन्य खर्च में बढोतरी होने से खर्च 15  हजार और बढ़ गए साथ ही आगन्तुक मेहमानों ने नकद रूपये के बजाय गिफ्ट के तौर पर सामान दे दिए जैसे गुलदस्ते इत्यादी| फिर क्या हुआ ?

  1. 25 हजार जो आने की उमीद थी वह राशि कम हो गयी,
  2.  15 हजार रूपये और उम्मीद से जो ज्यादा खर्च हो गए अर्थात कुल मिलाकर उन्हें 40 हजार रूपये कम हो गए जिससे वे केटरिंग और टेंट इत्यादी का बिल चुकता करने की स्थिति में नहीं है यह 40 हजार उनका बित्तीय घाटा कहा जायेगा अब उनके पास निम्न  उपाय  है –
  •  वे बैंक से लोन ले कर बिल चुकता कर सकते है
  • अपने किसी सम्पति इत्यादी को बेच कर यह घाटा पूरा कर सकते है 
  •  अपनी आमदनी बढाने के बारे में भी सोच सकते है

यदि यह अंतर छोटा हो तो  

  •  विकाश के लिए अच्छा माना जाता है क्योकि इससे बेहतर प्लानिंग की सीख मिलती है.
  • आदमी अपनी आमदनी बढ़ने के बारे में सोचता है 

लेकिन यह अंतर ज्यादा हो तो

  • वह आदमी ज्यादा परेशान रहेगा और कई बार घर की उचित खर्चो में भी कटौती करना शुरू कर देगा | हो सकता है क़ि अपने बच्चे का प्राइवेट स्कूल से निकाल क़र नगरपालिका के स्कूल में दाखिला करवा दे
  •  समय पर लोन न चूका पाने से बैंक क़ी क्रेडिट भी अच्छी नहीं रह जाती |
  •  बार बार ऐसा होने पैर बैंक भी लोन देने में दिक्कत क़र सकती है|

सरकार भी प्रत्येक साल परवरी में आने वाले वर्ष का वजट वित्त मंत्री के द्वारा पेश करती है जिसमे आने वाली आमदनी के बारे में उम्मीद लगायी जाती है जैसे सेवा कर , उत्पाद शुल्क ,आय कर इत्यादी और उसके अनुसार खर्चो का अलग अलग मदों में बंटवारा कर देती है
अब वजट घाटा  निम्न स्थितियो में हो सकता है जैसा कि उपर चर्चा कर चुके है

  •  आमदनी उम्मीद के अनुसार न हो 
  •  खर्च उम्मीद से ज्यादा हो जाये
  •  उपरोक्त दोनों 

इस घाटे क़ी भरपाई करने के लिए सरकार भी निम्नलिखित उपाय कर सकती है

  •  विदेशी बैंको से लोन ले 
  •  आमदनी बढाए जैसे क़ी टैक्स क़ी दर में वृद्धि करे या नए प्रकार का टैक्स लगाये
  •  विनिवेश से रूपये जुटाए जैसा की सरकार एनटीपीसी का अभी विनिवेश करके किया है 

जिस इकोनोमी का वित्तीय घाटा जितना अघिक होगा आर्थिक संकट भी उतना ही गहरा होगा ! इससे विदेशी बैंको से कर्ज मिलने परेशानी होती है और विदेशी कंपनियों का भरोसा सरकार के प्रति कम हो जाता है इससे विदेशी निवेश कम हो जाता है जो विकाश पर असर डालती है विकाश कम होने से बेरोजगारी बढती है और महंगाई जैसे संकट का सामना करना पड़ता है भारत जैसे देश के लिए वित्तीय घाटा को कम रखना बहुत जरुरी है ताकि विकाश क़ी गति में निरंतरता बनाये रखा जा सके |

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