करंट अफेयर्स: रक्षा खरीद में पारदर्शिता

 
  • रक्षा सौदों में दलाली क्यों क्यों होती है ? क्या आप जानते है ? अगर नहीं तो इस आर्टिकल को अवश्य पढ़े :

पिछले वैलेंटाइन डे पर मैंने अपनी पत्नी के लिए एक सरप्राइज ड्रेस बनवाने के लिए सोचा, तो मैंने उसे साथ लेकर एक बुटिक में पहुंचा । जब वंहा पहुंचे तो एक अच्छी सी सलवार कमीज सिलवाने के लिए दिया । ड्रेस की सिलाई के लिए उसने 850 रूपये लिए। ठीक उसी समय एक सुंदर युवती उस बुटिक में एक ड्रेस सिलवाने के लिए कपड़े लेकर पहुंची और उसने डिज़ाइनर को बताया की उसे डीप नेक के अतिरिक्त आगे एक V आकार का कट , पीछे L  आकार का कट और छोटे बाजू के साथ उस पर W आकार का कट चाहिए।

डिज़ाइनर ने कहा ठीक है ऐसा हो तो जायेगा परन्तु इसके लिए आपको 1250 रूपये देने होंगे । यह सुनकर मैंने उससे पूछा आप उससे 400 रूपये ज्यादा क्यों ले रहे हो ?
इतने में बुटिक का मालिक बोल पड़ा- भाई साहब साधारण सिलाई के लिए मेरी चार्ज 850 रूपये ही है, परन्तु कस्टमर की फरमाइश पर अगर हम कोई स्पेशल डिजाईन बनायेंगे तो कस्टमर को एक्स्ट्रा चार्ज तो देने ही होंगे । भारत सरकार ने भी तो अति विशिष्ट व्यक्ति (VVIP ) के लिए ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदा करने में अपनी फरमाइश के अनुसार हाइट को उपर नीचे करवाया था और जिसमें अति विशिष्ट व्यक्तियों के लिहाज से सुधार किया गया। इसके लिए रक्षा मंत्रालय ने इटली स्थित हेलीकाप्टर की निर्माता कंपनी, फिनमेक्केनिका को ज्यादा रूपये दिए थे की नहीं ? मैंने चुप रहना श्रेयस्कर समझा और कहा ये तो पैसे की बर्बादी है । वह फिर बोल पड़ा ये आप कौन सी नयी बात कर रहे है ये बात सरकार को भी तो नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने इसे संसाधनों की बर्बादी बताया था। क्या हुआ उसका ?
इसी प्रकार यदि किसी सरकार को कोई व्यवसायिक जहाज खरीदना हो तो उसकी कीमत अलग अलग कम्पनी के जहाजो का उनकी मॉडल के अनुसार बाजार में सबको पता है, जैसा की अलग अलग कारों का उनकी मॉडल के अनुसार निर्माता कंपनियों ने तय कर रखा है और लोग अपनी जरुरत के अनुसार कारों का चुनाव कर मोल भाव कर खरीद लेते है इस प्रकार की खरीद में ज्यादा रिश्वत की गुंजाइश नहीं रहती है ।इसी प्रकार व्यवसायिक जहाजो की खरीद फरोख्त में पारदर्शिता लगभग बनी रहती है , परन्तु जब बात डिफेन्स के लिए खरीद की होती है तो सबसे पहले रक्षा मंत्रालय को सेना अपनी जरुरत बताती है जिसमे विशेष रूप से उन सुविधाओ और जरुरतो का वर्णन रहता है उदाह्र्ण के लिए मान लीजिये की भारत को एक फाइटर एयरक्राफ्ट खरीदना है जिसमे मिसाइल छोड़ने की क्षमता के साथ कुछ अन्य खूबियाँ हो । अब सबसे पहले सरकार उन विनिर्माताओ की पहचान करती है जो इस प्रकार का एयरक्राफ्ट हमें दे सकते है उसके बाद उस जरुरत के लिहाज से उन सभी कंपनियों से वैश्विक निविदा ( ग्लोबल टेंडर ) मांगी जाती है जो हमारी विनिर्देश( स्पेसिफिकेशन ) के अनुसार लड़ाकू विमान का निर्माण कर सके । फिर उनको वायुसेना को भेज दिया जाता है । वायुसेना उसकी तकनीकी पड़ताल कर एक या दो कंपनियों के एयरक्राफ्ट के लिए अपनी सिफारिश कर देती है । चूँकि कोई भी सरकार सुरक्षा के दृष्टीकोण से न तो फाइटर एयरक्राफ्ट के बारे में जानकारी दे पाती है कि हम किस प्रकार का और किन खूबियों से युक्त एयरक्राफ्ट खरीद रहे है , न ही जो कंपनी आपूर्ति कर रही है वह कुछ विशेष विवरण देती है ।भारत वैसे भी एकल निविदा से बचना का प्रयास करता है लेकिन युद्धक सामग्री जैसे की फाइटर एयरक्राफ्ट की आपूर्ति करने वाला भी मुख्य रूप से तीन ही देश है- संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस और यूरोप ।ऐसी स्थिति में ज्यादा विकल्प भी नहीं रहता है। भारत के साथ फाइटर प्लेन लेने के अलावा उस के पार्ट्स इत्यादी की आपूर्ति भी सुनिश्चित करना चाहता है ।कई बार टेक्नोलॉजी के स्थानांतरण इत्यादी के मसले भी साथ होते है जिससे मूल्य में भारी अंतर आ जाता है । ।फिर कल पुर्जो की आपूर्ति एक अहम् बात है।अब यहाँ से मोलभाव शुरु होता है। अतः ऐसी स्थिति में विचौलियों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है । ये लोग कोई और नहीं होते बल्कि सरकार में ऊँचे पदों पर आसीन लोग ही होते है जो स्वयं या अपने रिश्तेदारों के माध्यम से थोड़े से रुपयों के लिए पक्षपातपूर्ण फैसला ले लेते है। यही से इसमे दलाली या रिश्वत जैसे शब्दों समावेश हो जाता है ।हालाँकि भारत सरकार के नियमावली में रक्षा सौदों की खरीद में विचौलियों की कोई भूमिका नहीं है ।केंद्र सरकार ने अति विशिष्ट व्यक्तियों के प्रयोग के लिए 12 एडब्ल्यू 101 हेलिकॉप्टर की खरीद के लिए हुए अनुबंध को रद्द करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। यह पारदर्शिता बनाये रखने के लिए एक सराहनीय कदम है ।इससे भविष्य में विचौलियों की भूमिका समाप्त हो सकेगी । गुणवता और विशिष्टता के आधार पर ही आगे से रक्षा सौदों जैसे आर्टिलरी ,युद्धक पोत इत्यादी की खरीद हो सकेगी । आशा है इससे सेना के मनोबल पर कोई नकारात्मक प्रभाव नहीं पड़ेगा और देश की आतंरिक और बाहरी सुरक्षा अभेद्ध रहेगा ।भारत अपनी सामरिक क्षमता को वैश्विक स्तर पर कायम रखेगा । जय भारत !!!

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