IAS Mantra Series: Node of Credit Market-2

 
  •  एक कुशल ऋण बाजार का किसी अर्थव्यवस्था  और  वित्तीय तंत्र  में क्या महत्व है ?

 जिस प्रकार एक कुशल कारीगर अपना काम काफी कुशलता से कर विनिर्माण लागत में बचत करता है उसी प्रकार एक कुशल ऋण तंत्र   सरकार के लिए  किफायती कीमतों पर वित्तीय संसाधन को जुटाता है और सरकार की  उधारी लागतों में कमी करने के लिए उपाय करता है । सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए फंडिंग और संस्थागत फाइनेंसिंग पर बोझ कम करना भी कुशल ऋण बाज़ार से संभव है । आम निवेशक अपनी धन को सुरक्षित रखने के लिए एफडी या सोने  में निवेश करने की इच्छा रखते है ।कई जमीन खरीदने जैसे पुराने माध्यमों में भी यकीन रखते है । अब उनके लिए इन सबके अलावा एक नया वे सुरक्षित माध्यम ऋण तंत्र में निवेश करने को मिलेगा। आम निवेशको के निवेश से बाजार के  भागीदारों में विविधता आती है।जिससे कोई भी अपनी सुविधा  के अनुसार अपने लिए ऋण की व्यवस्था कर सकता है ।

  • ऋण प्रतिभूतियों से जुड़े हुए आम निवेशक के लिए अलग–अलग जोखिम क्या है?

ऋण प्रतिभूतियों से आम निवेशक के लिए कई तरह के जोखिम जुड़े हुए हैं।आइये इसे समझने के लिए निम्न प्रकार की जोखिम पर बारी-बारी से  चर्चा करते है ..

ब्याज दर के कारण जोखिम: ब्याज की दर बाज़ार की चाल और रिजर्व बैंक की नीतियों के अलावा डिमांड- सप्लाई (मांग -आपूर्ति ) जैसे अन्य कारको से परिवर्तनशील रहता है अत :बाजार में ब्याज दरों में कभी कभी अचानक बदलाव आ जाता है इस बदलाव से  पैदा हुए जोखिम का  असर अंतिम  रूप से होने वाली आय  पर पड़ता हैं। इसलिए अच्छी बात  यह होगी कि निवेशक ऐसे समय में निवेश करे  जब ब्याज दरें कम हो और ब्याज दरों में बढोतरी हुई हो। ऐसे में ऋण देने वाले को बढ़ी हुई ब्याज दरों का फायदा मिलेगा।आम तौर पर वित्तीय संस्थाए लोगो को पहले साल के लिए कम ब्याज की दर पर सस्ते ऋण का प्रलोभन देती है और जब व्याज की दर में बढ़ोतरी होती है तो उन्हें इसका फायदा मिलता है ।

डिफॉल्ट रिस्क (Default Risk ):ऋण देने वाले को सदैव ही इस बात का जोखिम रहता है कि कही उसका निवेश डूब न जाये । इस तरह के जोखिम तब उत्पन्न होती है जब  बांड को जारी करने वाला न तो  समय पर ब्याज दरों का भुगतान  कर पाता है न ही प्रतिभूति पर निवेश किया गया  मूलधन का ही  भुगतान  कर पाता है। सहारा की हाउसिंग कंपनी में मेरा किया गया  निवेश भी इस प्रकार की जोखिम में है । कंपनी न तो मुझे हाउस उपलब्ध कराया न ही 13  % की दर से ब्याज सहित मेरा मूलधन  वापस कर रही है । इस प्रकार की कंपनी डिफाल्टर  कंपनी कही जाती है । इस प्रकार के जोखिम को  क्रेडिट रिस्क कहते है ।

पुर्निवेश दर जोखिम(Reinvestment Risk ):जब  ब्याज दरों के गिरने की संभावना होती है  तो निवेश के ज्यादा विकल्प होते है इस वजह से नियमित अंतराल में बाजार की तुलना में ऊंची ब्याज दर वाली प्रतिभूतियों में निवेश करने  की संभावना रहती है ।

ऋण प्रतिभूतियों के कारोबार में भी कई सारे जोखिम हैं |आइये उन्हें भी  बारी-बारी से समझते है  …

  • प्राइस रिस्क (Price Risk) : अपने प्रोडक्ट को बाज़ार में बेंचने के लिए एक संभावित कीमत तय की जाती  है जब कीमतों में अचानक बदलाव आ जाने से या की गई उम्मीद  के अनुसार कीमतें न मिलने से जो जोखिम पैदा हो सकती है उस सम्भावना से संबधित जोखिम प्राइस रिस्क जोखिम होता है ।
  • काउंटर पार्टी रिस्क (Counter Party Risk)किसी भी प्रकार के लेन देन से जुड़ा यह एक  सामान्य जोखिम है । यह तब  उत्पन्न होगा जब दूसरी पार्टी अपने  सेटलमेंट के समय किए गए अनुबंद्ध या वादों का पूरा न कर पाए ।सहारा कम्पनी के द्वारा निवेशको से लिए गए रकम कम्पनी के वादे के मुताबिक वापस नहीं हो रहे है जिससे सुप्रीम कोर्ट को दखल देना पड़ रहा है । 
  •  निश्चित आय वाले इस ऋण बाजार का नियामक कौन है जिसके  दिशा निर्देश से इस बाज़ार में लेन देन होता है  ?  

इस प्रकार की प्रतिभूतियों के  कारोबार का नियमन अलग–अलग सरकारी संस्थाएं करती है। जैसे भारतीय रिजर्व बैंक का नियंत्रण  विभिन्न बैंकों  द्वारा जारी किए गए बांडों और अन्य प्रतिभूतियों पर रहता है।इसी प्रकार  गैर सरकारी प्रतिभूतियों के नियमन के लिए सेबी नामक एक संस्था है जिसके पास इस बात की जिमेदारी है और इनके खरीद बिक्री के लिए बिभिन्न स्टॉक एक्सचेंज होते है । जैसे BSE ,NSE ,DSE इत्यादि ।सेबी के  दिशा निर्देश से  इन स्टॉक एक्सचेंज के जरिये  इस बाज़ार में लेन देन होता है

  •    ट्रेजरी बिल और सरकारी  प्रतिभूतियों के प्रमुख लक्षण क्या हैं| भारत के संदर्भ में इसकी क्या उपयोगिता है ?

सभी सरकारी प्रतिभूतियां भारत में इस समय रिजर्व बैंक द्वारा भारत सरकार की ओर से जारी की जाती है। आम तौर पर इनका अंकित मूल्य 100 रुपए होता हैजिसे इसका Par Value भी कहते है । इस प्रकार की प्रतिभूतियों पर एक निश्चित ब्याज दर निर्धारित होती हैअर्थात इनका एक कूपन रेट (ब्याज दर ) होता है । इन प्रतिभूतियों पर अर्धवार्षिक या 5 से 30 साल की अवधि पर ब्याज की अदायगी आमतौर पर होती है।इस अवधि तक इसमें से धन निकलने की मनाही होती है या धन निकलने पर पेनल्टी ली जाती है । प्रपत्र के अनुसार इसमें बदलाव हो सकता है।लम्बी अवधि के लिए निवेशक इस प्रकार की प्रतिभूतियों में निवेश करते है ।
छोटे समय के लिए धन की व्यवस्था करने के लिए रिजर्व बैंक द्वारा जारी किए जाने वाले अल्पावधि प्रपत्र को ट्रेजरी बिल कहा जाता है। इनकी परिपक्वता की अवधि 91 दिन से लेकर 364 दिन की होती है यानि कि एक साल से कम । इनका भी अंकित मूल्य 100 रुपए ही होता है, लेकिन कोई कूपन रेट (ब्याज दर ) नही होता है। इसके बदले ये अंकित मूल्य से कम मूल्य पर ही जारी किए जाते हैं। जैसे, 100 का ट्रेजरी बिल 90 रूपये में निवेशक को जारी किया जा सकता है। यही 10 रुपये का अंतर निवेशक का फायदा होता है, जो उसे परिपक्वता के बाद मिल जाता है। राज्य सरकारों की प्रतिभूतियां भी रिजर्व बैंक द्वारा ही संबंधित राज्य सरकारों की ओर से जारी की जाती हैं।संचित धन की उपयोगिता बनाये रखने के लिए प्रतिभूतियों में निवेश करना एक सकारात्मक कदम है | एक तो इससे धन की उपयोग हो जाता है आय में वृद्धि होती है जिससे इन्फ्लेसन से उत्पन्न हुए हालत से निपटने में सहूलियत मिलती है । अगर आपके पास रूपये है तो निवेश कीजिये । मेरी शुभकामना आपके साथ है |

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