IAS Mantra Series: BRICS-A Vision With New Dimension

 

आइये सबसे पहले समझते है कि ब्रिक्स है क्या ?

जिस प्रकार हम अपने हित का ध्यान रखने के लिए अलग अलग प्रकार के संगठन, सोसाइटी अथवा समूहों का गठन करते है जिससे हमारा सामाजिक और आर्थिक विकाश हो सके । उसी प्रकार अलग अलग देश भी अपनी सामाजिक आर्थिक हितो का ध्यान रखते हुए आपस में मिलकर एक संगठन बनाते है ।जिस प्रकार दोस्ती बराबर वालों में होती है ऐसा प्राय: लोग कहते है। ये ऐसा हो या न हो लेकिन ऐसा देखा गया कि सामान विचारधारा वाले लोग एक मंच बनाते है ,सामान इनकम वाले  लोग एक क्लब के मेम्बर बन जाते है । उसी प्रकार सामान आर्थिक तथा सामाजिक ढांचा वाले देश भी एक समूह बना लेते है । जैसे OPEC , ASIAN इत्यादि । आर्थिक तथा सामाजिक आधार पर देश भी अलग अलग वर्गों में वर्गीकृत है । प्रथम पंक्ति में वे देश आते है जो बाकी देश कि तुलना में काफी विकसित है। उनका  सामाजिक आर्थिक ढांचा बहुत मजबूत है । औद्योगीकरण काफी पहले हो चूका है । शिक्षा ,स्वास्थ्य ,तकनीक , मशीनीकरण और अनुसन्धान के क्षेत्र में बहुत आगे है । इन्हें विकसित देश कहा जाता है ।इस श्रेणी में USA, United Kingdom, France, Italy, Canada, Germany and जापान इत्यादि जैसे देश आते है ।इन्होने मिलकर एक समूह बनाया है जिसे G7 के नाम से जानते है । दूसरी पंक्ति में वे देश आते है जो इन देशों क़ी तुलना में थोड़े कम विकसित है, परन्तु विकाश क़ी गति तेज है।इन्हें विकाशशील देश कहा जाता है । Brazil, Russia, India and China , South Africa इसी श्रेणी में आते है । 2003 में Goldman Sachs,जो एक  leading global investment banking, securities and investment management firm है , के  जाने माने अर्थशास्त्री Jim O’Neill  के विचार में यह आया कि अगर ये देश आपस में मिलकर G7 के जैसे एक समूह बना ले तो इनके विकाश में और तीव्रता लाया जा सकता है और उन्होंने एक सब्जबाग दिखाया कि अगर ये समूह आपसी सहयोग करे तो 2040 तक तो ये G7  से भी आगे निकल सकते है |आमतौर पर ऐसा होता है कि हम दुसरे लोगो अथवा समूहों का अनुसरण करते है ।इसलिए जून 2009 में येकातेरिनबर्ग, रूस में इन देशों ने वैश्वीकरण के पश्चात् उत्पन्न चुनौतियों और अवसरों के लिए आपसी प्रतिक्रिया जानने एवं  विचारों को साझा करने के लिए एक मंच के रूप में BRIC को स्थापित किया गया |। दक्षिण अफ्रीका विकासशील देशों के हितों की एक मुखर चैंपियन है । इस तथ्य को देखते हुए ब्रिक सम्मेलन में आमंत्रित नहीं किया गया था । दक्षिण अफ्रीका इस तथ्य से खुश नहीं था।. दक्षिण अफ्रीका ने  बाद ब्रिक गठन के भाग के रूप में मान्यता हासिल करने की मांग की है।अब साउथ अफ्रीका के शामिल होने के बाद यह पांच देशो का समूह बन गया है और इन देशो के प्रारम्भिक अक्षर के मिलाने से ब्रिक्स (BRICS: B-Brazil,R-Russia,I- India ,C- China , S-South Africa) कहा जाता है ।ब्रिक्स समूह का मुख्य उदेश्य  शांति, सुरक्षा, विकास और आपसी सहयोग हासिल करना है । मानवता के विकास में महत्वपूर्ण योगदान के साथ साथ  न्यायसंगत और निष्पक्ष तंत्र  स्थापित करना है|

 ब्रिक कल्पना के बाद जल्द ही गोल्डमैन सैक्स महत्वपूर्ण प्रगति कर रहे देशों का एक और समूह की पहचान की है और भविष्य की सफलता के लिए इन्हें भी सब्जबाग दिखाया जा रहा है ।ये देश है : कोरिया, तुर्की, मेक्सिको, इंडोनेशिया, ईरान, पाकिस्तान, फिलीपींस, मिस्र, नाइजीरिया, बांग्लादेश और वियतनाम। इन देशों का चयन इनकी अर्थव्यवस्थाओं की ताकत के आधार पर किया गया है ।इस समूह को  एन 11 के रूप में जाना जाता है ।

जैसा कि हम चर्चा कर चुके है  कि  ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों का संगठन है लेकिन यह समझना कि वह अमेरिका या G7   को चुनौती देगा,यह वास्तविकता से परे है। इसका कारण सदस्य देशों के बीच सामंजस्य कि कमी है । इन देशों के बीच सीमा विवाद सहित कई विवाद हैं जो उनके बीच बेहतर सहयोग के रास्ते में रोड़ा है।

ब्रिक्स  का चौथा वार्षिक शिखर सम्मेलन  का आयोजन भारत की राजधानी नई दिल्ली , में 29 मार्च, 2012 को किया गया था ,जिसमें इसके पाँच सदस्य राष्ट्रों ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्र या सरकार प्रमुखों ने भाग लिया। शिखर सम्मेलन का विषय था “वैश्विक सुरक्षा, स्थिरता और समृद्धि के लिए ब्रिक्स भागीदारी”। शिखर सम्मेलन में चर्चा का मुख्य विषय विकासशील देशों के लिए विश्व बैंक के समान एक ब्रिक्स बैंक का गठन करना था।उस समय इसमें कुछ खास प्रगति तो नहीं हो पाई परन्तु उस अवधारणा को पांचवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन,
जो कि दक्षिण अफ्रीका के डरबन इंटरनेशनल कन्वेंशन सेंटर (आईसीसी) पर 26 से 27 मार्च, 2013 को  आयोजित किया गया  ,में गरीब मुल्कों के हितों को ध्यान में रखते हुए ब्रिक्स डेवलपमेंट बैंक बनाने का फैसला किया गया है।  इस बैंक में देश अपनी पूंजी लगा सकते हैं। बैंक के लिए संसाधन जुटा सकते हैं और अपनी मदद स्वंय कर सकते हैं और साथ ही दूसरे देशों की भी मदद कर सकते है । ब्रिक्स देशों द्वारा विचाराधीन विकास बैंक का मकसद नकदी की समस्या से जूझने वाले देशों की मदद करेगा । यह बैंक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष यानी आईएमएफ जैसी संस्थाओं का विकल्प नहीं होगा।  ब्रिक्स देशों ने यह भी कहा है कि उनका बैंक विश्व बैंक का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक होगा। यह आकस्मिक प्रबंध उन देशों की तीन से 12 महीनों की सहायता के लिए है जो नकदी की समस्या से जूझ रहे हैं। इसलिए यह एक नकदी सहायता तंत्र है जो ब्रिक्स देश एक दूसरे की मदद के लिए बना रहे हैं जो नकदी की समस्या का सामना कर रहे हैं।

फिर भी यह उम्मीद करना महज एक कल्पना  है कि ब्रिक्स देश शक्ति का केंद्र बन सकते हैं और मौजूदा वैश्विक व्यवस्था को तोड़ सकता हैं, जिसमें अमेरिका और पश्चिमी देशों का दबदबा है। क्योंकि ब्रिक्स के सदस्यों के बीच इस बारे में मतभेद बताए जाते हैं कि बैंक के लिए कितनी रकम जुटाने की जरूरत है और इसका मुख्यालय कहां होगा । ब्रिक्स देश नए बैंक को शुरुआती 100 अरब डॉलर की पूंजी के साथ शुरू करना चाहते हैं लेकिन इस बारे मे मतभेद हैं कि क्या हर एक देश को  बराबर  का योगदान करना चाहिए या फिर सदस्य देश अपनी अर्थव्यवस्था के हिसाब से कम या ज्यादा योगदान भी दे सकते हैं । चीन की अर्थव्यवस्था दक्षिण अफ्रीकी अर्थव्यवस्था के 20 गुनी है तो रूस या भारत की अर्थव्यवस्था के मुकाबले वो चार गुनी बड़ी है। वैसे इस बैंक का काम उभरते हुए और विकासशील देशों में सड़कों, बंदरगाहों, बिजली परियोजनाओं और रेल सेवाओं के लिए मदद देना होगा। अंत में आपसी एक सहमती बनी है कि पांच उभरते देशों की इस आपसी व्यवस्था में चीन ने 41 अरब डॉलर, भारत, रूस और ब्राजील ने 18-18 और दक्षिण अफ्रीका ने 5 अरब डॉलर योगदान करने का वचन दिया है।जिससे 100  अरब डॉलर कि पूंजी प्रतीकात्मक रूप से जमा हो सकेगी ।प्रतीकात्मक इसलिए क्योकि इसके लिए किसी को फिलहाल अपनी जेब से एक भी रुपया नहीं निकालनी है। लेकिन आने वाले समय में इनमें से किसी भी देश के बैंकिंग सिस्टम पर वैसा कोई खतरा आया, जैसा ग्रीस में या अभी हाल में साइप्रस में आया था, तो मदद के लिए आईएमएफ के सामने झोली फैलाने से पहले वह ब्रिक्स के साझा वचन पर टिके इन 100 अरब डॉलरों का भरोसा कर सकता है।

अभी तक दुनिया भर में विकास योजनाओं की वित्तीय  मदद की जिम्मेदारी पश्चिमी देशों के दबदबे वाले विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (IMF) पर रही है। बैंक के गठन के प्रस्ताव और इसके संचालन की व्यवस्था पर गहन विचार-विमर्श किया गया है परन्तु अभी और विचार विमर्श किया जाना है।  इसके मुख्यालय को लेकर भी अभी तस्वीर साफ नहीं हुई है। भारत ने इसकी दावेदारी से पहले ही हाथ खींच लिए हैं। इसलिए माना जा रहा है कि ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय दक्षिण अफ्रीका में ही हो सकता है।अभी इस बैंक के कामकाजी उद्देश्य स्पष्ट नहीं हैं। लेकिन निश्चित ही यह उद्योगों की फंड जरूरतों को पूरा करने में अहम भूमिका निभाएगा।

 इसे मूर्त रूप लेने में अभी काफी वक्त लगेगा। अभी यह भी तय नहीं है कि इस बैंक का शुरुआती कोष कितना होगा, किस देश की हिस्सेदारी कितनी होगी, किन क्षेत्रों को इससे मदद मिलेगी। लेकिन सूत्रों का मानना है कि बैंक का कोष 50 से 100 अरब डॉलर के बीच रह सकता है। ब्रिक्स देशों में दुनिया की एक तिहाई से ज्यादा आबादी रहती है। विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद [जीडीपी] में इन देशों की हिस्सेदारी 25 प्रतिशत है। ब्रिक्स बैंक को उद्योग जगत का भी समर्थन मिल रहा है।अमेरिका और यूरोपीय यूनियन के बाद यह दुनिया का तीसरा बड़ा आर्थिक संगठन बन गया है। यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि ब्रिक्स देशों का निर्यात विश्व निर्यात का करीब 20 फीसदी हो गया है। विश्व के कुल सकल घरेलू उत्पाद में हमारी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत है। लिहाजा अमेरिका और यूरोप की आर्थिक ताकत कम होने के इस दौर में ब्रिक्स के पास बड़ी आर्थिक भूमिका निभाने का मौका है।

हमारे इन देशों में दुनिया की 40 फीसदी आबादी रहती है. ब्रिक्स देशों के पास प्राकृतिक संसाधनों के बड़े भंडार हैं|वस्तुतः ब्रिक्स देश एक-दूसरे के लिए भी महत्वपूर्ण आर्थिक उपयोगिता रखते हैं। मसलन, ब्राजील और रूस उन जिंसों के निर्यातक हैं, जिनकी जरूरत भारत और चीन को है। ब्राजील और रूस के पास कमोडिटी की बड़ी ताकत भी है। उनके पास अच्छी तरह तैयार किया गया औद्योगिक आधार है और प्रशिक्षित कर्मचारी भी हैं|दक्षिण अफ्रीका खनिज संसाधनों से भरपूर है। इसी तरह चीन के पास मैन्युफैक्चरिंग और भारत के पास सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की बड़ी ताकत है। ब्राजील अब तक यूरोप और अमेरिका को कृषि पदार्थों व खनिजों का निर्यात करता था, लेकिन चीन की बढ़ती मांग ने उसके सोयाबीन क्षेत्र की रफ्तार बढ़ाने में भी अहम भूमिका अदा की है।यह भी उल्लेखनीय है कि पिछले साल अमेरिका को पीछे छोड़ते हुए चीन ब्राजील का सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी हो गया है। लंबे समय तक रूस अमेरिका को प्राकृतिक संसाधनों का बड़ा निर्यातक रहा है। लेकिन अब एशिया में रूस का निर्यात बढ़ रहा है। अब तक रूस का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी जर्मनी था। लेकिन अब रूस का सबसे बड़ा कारोबारी सहयोगी चीन है। इसी तरह भारत सेवा क्षेत्र में ब्रिक्स देशों का अग्रणी आईटी सहयोगी देश बनता जा रहा है।

भारत अब तक बुनियादी परियोजनाओं के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से ऋण लेता रहा है। पर उनकी शर्तें कड़ी होती हैं। इसके अलावा अधिकांश वैश्विक वित्तीय संस्थाएं ऋण देने के साथ अपना एजेंडा भी थोपती हैं। ऐसे में, ब्रिक्स बैंक की स्थापना से खास तौर से भारत को आधारभूत संरचना के विकास में बड़ा निवेश सरलता से प्राप्त हो सकेगा।

कई अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर ब्रिक्स देशों में मतभेद हैं, फिर भी इन्होंने तय किया है कि वे प्रभावी आर्थिक संपर्क और समन्वय से परस्पर उद्योग-व्यापार की सूरत संवारेंगे और आर्थिक मुश्किलों का मिल-जुलकर सामना करेंगे।कई अंतरराष्ट्रीय मामलों और मंचों पर ब्रिक्स देश अपने-अपने हितों से प्रभावित होते हुए अलग राह पर चलते देखे गए हैं। फिर भी सहयोग की प्रकिया अगर सतत जरी रहे तो अगले साल ब्राजील में होने वाली ब्रिक्स समिट में इस पर आगे बढ़ा जा सकेगा। आखिर कड़ी से कड़ी जोड़ने से ही तो चेन बनता है तो क्यों न कुछ सकारात्मक पहलु को संजोये रखे ।

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