यह एक ऐसा विषय है जिस पर कुछ लिखना बहुत जवाबदेही सुनिश्चित करने के साथ साथ सामाजिक आर्थिक स्थिति को मद्देनजर रखते हुए लोगों को इसके विभिन्न पहलुओं में अवगत कराना एक जोख़िम भरा कार्य है। ऐसा इसलिए है कि समाज के लोग स्पष्ट तौर पर अलग अलग राय रखते हैं जिससे इस मुद्दे पर समाज दो धड़ों में बंटा नजर आता है।
एक वर्ग वह जो इस व्यव्स्था से लाभान्वित होता है उसके आरक्षण के पक्ष में बहुत से तर्क है। वही दूसरा वर्ग जो आरक्षण के कारण अपेक्षाकृत अधिक योग्य होने के बावजूद मिलने वाले अवसर से वंचित रह जाता है। इस वर्ग के पास भी आरक्षण के विरोध में असंख्य तर्क है। किसी तर्क को न तो पूर्ण रूप से नकारा नहीं जा सकता चाहे वह आरक्षण के समर्थन में हो या विरोध में। सबसे मुश्किल स्थिति यह है कि तर्क और कुतर्क में बहुत बारीक अंतर ही है जिसे कोई भी पक्ष इसलिए स्वीकार नहीं कर पाते क्योंकि दोनों ही वर्ग के मन में कड़वाहट एक दुसरे के प्रति इतना ज्यादा है कि एक दुसरे की तर्क को समझना तो दूर सुनना भी गंवारा नहीं है।
जब मैं छात्र था इस आरक्षण व्यव्स्था के कारण स्वयं प्रभावित हुआ था उस समय ही प्रधानमंत्री स्वर्गीय विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार के फैसले से 7 अगस्त 1990 को मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुआ। और अचानक से जो आरक्षण 22.5% था वह 27% बढ़कर 49.5% तक हो गया। यह सामान्य वर्ग के छात्रों के लिए किसी ब्रजपात से कम न था। देशव्यापी आंदोलन और प्रदर्शन हुआ सैकड़ों छात्रों की जान गईं जिनमें से आत्मदाह करने जैसी घटनाएं भी शामिल था। तकरीबन 200 छात्रों ने आत्मदाह का प्रयास किया जिनमें से 62 की मौत हो गई।
बोफोर्स घोटाले का आरोप तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर लगाकर स्वर्गीय राजीव गांधी के खिलाफ एक ऐसा माहौल बनाया गया था जिसके नायक विश्वनाथ प्रताप सिंह थे। अगले चुनाव में 1989 में कांग्रेस जीत नहीं पाई और विश्वनाथ प्रताप सिंह के नेतृत्व में सरकार बनाने में सवर्णों की अहम भूमिका निभाई। लेकिन चुनाव के बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह ने मंडल कमीशन लागू किया जिससे सवर्णों में जबरदस्त नाराजगी जताई और विश्वनाथ प्रताप सिंह को खलनायक के रूप में देखा जाने लगा।
मैं ठीक उसी समय अर्थात् 1990 में गणित ऑनर्स लंगट सिंह महाविधालय मुज्जफरपुर से उत्तीर्ण हुआ था। ” सिर मुड़ाते ओले पड़े” जैसी कहावत चरितार्थ होती हुईं प्रतीत होता दिख रहा था। सामान्य रुप से इस व्यव्स्था के प्रति एक क्षोभ प्रकट हुआ जो कड़वाहट के साथ लंबे समय अंतराल तक मन मस्तिष्क पर आच्छादित रहा। यहां तक कि एक बार नही बल्कि बार बार आरक्षण व्यव्स्था का प्रभाव हमारे कैरियर पर पड़ा। मन में एक मलाल रह गया और हम जो चाहते थे वह बन न सके। आज भी सामान्य वर्ग के जिन छात्र छात्राओं को ऐसे अवसर पर बेहतर होने के बावजूद आरक्षण व्यव्स्था के कारण से अवसर हाथ से निकल जाता है उनके मन में भी ऐसी कड़वाहट होती है। मैं उनके मनोभाव को समझता हूं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसी व्यव्स्था आखिर की ही क्यो गई है। जब मैंने इसके जड़ में गया और इसपर काफी कुछ पढ़ा तो इसकी प्रासंगिकता मुझे समझ आई। आप भी इसे समझ सकते हैं लेकिन समझने के लिए आपको अपने मन में से इस व्यव्स्था के प्रति कुंठित भाव और पूर्वाग्रह को बाहर रखना होगा। आइए, समझते हैं कि आरक्षण व्यव्स्था क्यों है ?
आरक्षण के कारण
भारत का गणतंत्र , समाजवादी ,सामाजिक आर्थिक और सांस्कृतिक न्याय और समता की वकालत करता है ।
समाजवादी शब्द का आशय यह है कि ‘ऐसी संरचना जिसमें उत्पादन के मुख्य साधनों, पूँजी, जमीन, संपत्ति आदि पर सार्वजनिक स्वामित्व या नियंत्रण के साथ वितरण में समतुल्य सामंजस्य हो। क्या ऐसा हम कह सकते हैं कि इन सभी संसाधनों पर सामान्य रूप से वितरण रहा है। वस्तुत ऐसा है नहीं। जो लोग दलित वर्ग में है उन्हें इन संसाधनों पर उतना हक सदियों से नही मिला जितना सामान्य वर्ग के लोगों का रहा है।
न्याय : न्याय का भारतीय संविधान की प्रस्तावना में उल्लेख है, जिसे तीन भिन्न रूपों में देखा जा सकता है- सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय व आर्थिक न्याय।
सामाजिक न्याय से अभिप्राय है कि मानव-मानव के बीच जाति, वर्ण के आधार पर भेदभाव न माना जाए और प्रत्येक नागरिक को उन्नति के समुचित अवसर सुलभ हो। यहीं वह कथन है जिसमे बहस की गुंजाइश रहती है। आरक्षण के विरोध करने वाले यह कहते हैं अगर किसी को विशेष दर्जा प्राप्त हों तो अवसर की समानता कैसे है। जबकि आरक्षण का समर्थन करने वाले यह कहते हैं कि चुंकि सामाजिक आर्थिक समानता नहीं है इसलिए अवसर की समानता की बात करना तब तक सार्थक नहीं माना जाएगा जब तक कि सामाजिक आर्थिक समानता न हो। उदाहरण के लिए एक शिक्षित परिवार का बच्चा शाहरों में 3 वर्ष की उम्र से पढ़ाई लिखाई किसी कॉन्वेंट स्कूल में शुरु कर देता है । 20-21 साल की उम्र में ग्रेजुएट हो जाता है जबकि एक गांव का बच्चा 6-7 वर्ष की उम्र से पढ़ाई किसी सरकारी विद्यालय में शुरु करता है जहां पढ़ाई लिखाई का स्तर उतना अच्छा नहीं रहता जैसा कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों का होता है। अत 24-25 वर्ष की उम्र में ग्रेजुएट होने के बावजूद भी इसका शैक्षणिक योग्यता में बहुत ज्यादा अंतर हो जाता है।
मान लीजिए सिविल सेवा परीक्षा की अधिकतम आयु 28 वर्ष हो जैसा की पहले था । तो 20 वर्ष की उम्र में ग्रेजुएट होने वाले छात्र के पास परीक्षा में शामिल होने के लिए 7-8 अवसर उपलब्ध होंगे जबकि 24 वर्ष की उम्र में ग्रेजुएट होने वाले छात्र छात्राओं के पास 4-5 अवसर उपलब्ध होंगे। क्या यह अवसर की समानता कही जाएगी ? निश्चित रूप से आपका उतर होगा नही ? अत समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए ग्रामीण इलाकों के छात्रों को ऊपरी आयु सीमा में कम से कम 3 वर्ष की छूट तो देना ही होगा ताकि दोनो प्रकार की पृष्टभूमि के छात्रों को समान अवसर उपलब्ध हों सके।
जिस प्रकार से शहरी और ग्रामीण छात्रों की शैक्षणिक पृष्ठभूमि अलग अलग होने पर अवसर की समानता उपलब्ध कराने के लिए ऊपरी आयु सीमा में कुछ छूट देना चाहिए उसी प्रकार आर्थिक समाजिक पृषभूमि अलग अलग होने पर भी समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए अलग से प्रावधान करना पड़ा।
आर्थिक न्याय का अर्थ है कि उत्पादन एवं वितरण के साधनों का न्यायोचित वितरण हो और धन संपदा का केवल कुछ ही हाथों में केंद्रीकृत ना हो जाए। हकीकत यह कि बहुत लम्बे समय के संपति का संग्रह कुछ हाथो में ही रहा है चाहें जमीन हो या कोई और संपदा। समाज का एक वर्ग ऐसा रहा है जिसके पास इन संसाधनों से कतिपय कारणों से वंचित रहा है। जो कुछ जमीन इनके पास थीं भी मध्यकाल में सामंत वर्ग ने येन केन प्रकार से उन्हें हथिया ली और उनका विभिन्न प्रकार से शोषण किया। अब आर्थिक समानता लाने के लिए सरकार द्वारा उन्हें विभिन्न प्रकार से मदद मुहैया कराया जाता है जिससे उनका आर्थिक सशक्तिकरण हो। इसमें एक उपाय सरकारी नौकरियों में आरक्षण भी है।
राजनीतिक न्याय का अभिप्राय है कि राज्य के अंतर्गत समस्त नागरिकों को समान रूप से नागरिक और राजनीतिक अधिकार प्राप्त हो, चाहे वह राजनीतिक दफ्तरों में प्रवेश की बात हो अथवा अपनी बात सरकार तक पहुँचाने का अधिकार। इसलिए सरकार विभिन्न वर्गो का उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए पंचायत स्तर से लेकर लोकसभा चुनाव तक आनुपातिक सीट आरक्षित किया है।
समता :
भारतीय संविधान की प्रस्तावना हर नागरिक को स्थिति और अवसर की क्षमता प्रदान करती हैं जिसका अभिप्राय है समाज के किसी भी वर्ग के लिए विशेषाधिकार की अनुपस्थिति और बिना किसी भेदभाव के हर व्यक्ति को समान अवसर प्रदान करने की उपबंध। समान अवसर उपलब्ध कराने के लिए सरकार महिलाओं , अनुसूचित जाति और जनजाति, पिछड़ी जातियों और आर्थिक रूप से कमजोर अभ्यर्थियों के लिए आरक्षण की व्यव्स्था की है। जिससे इन वर्गों को आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिल सके।
अब कुछ ज्वलंत सवाल मन में आते है जिनका जवाब तलाशना होगा ?
1. क्या आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 14 के द्वारा प्रदत्त अधिकार के खिलाफ नही है ?
अनुच्छेद 14 भारत के भू भाग में रहने वाले सभी व्यक्तियों को चाहे वह भारत का नागरिक हो यह विदेशी हो विधि के समक्ष समता का अधिकार प्रदान करता है। परंतु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया है। सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए लाया गया संविधान (124वां संशोधन) विधेयक लोकसभा में पारित हो गया है। इसके लिए अनुच्छेद 15 में 15.6 जोडा गया। जिसके अनुसार राज्य और भारत सरकार को इस संबंध में कानून बनाने से नहीं रोका जा सकेगा. इसके अनुसार आर्थिक रूप से दुर्बल सामान्य वर्ग को शैक्षणिक संस्थानों में 10 फ़ीसदी आरक्षण का प्रस्ताव किया गया है। ग़रीब सवर्णों को प्रस्तावित 10 फ़ीसदी आरक्षण मौजूदा 50 फ़ीसदी की सीमा से अलग होगा। अनुच्छेद 16 में एक बिंदु को जोड़कर इसका प्रावधान किया गया।
सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता, लेकिन राजस्थान जैसे कुछ राज्यों ने 68% आरक्षण का प्रस्ताव रखा है, जिसमें अगड़ी जातियों के लिए 14% आरक्षण भी शामिल है। सर्वोच्च न्यायलय में इन पर मुकदमे चल रहे हैं। उदाहरण के लिए जाति-आधारित आरक्षण भाग 69% है और तमिलनाडु की करीब 87% जनसंख्या पर यह लागू होता है ।
पिछली यूपीए सरकार ने भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद की विशेषज्ञ समिति की सिफारिश पर जाटों को आरक्षण देने का फ़ैसला किया था।
अदालत ने इसे ग़लत ठहराते हुए कहा है कि तत्कालीन सरकार ने राष्ट्रीय पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट को नजरअंदाज़ किया. कोर्ट का कहना था कि ज़ाति आरक्षण देेने के लिए एक महत्वपूर्ण कारक है, लेकिन पिछड़ापन निर्धारित करने के लिए यह अकेले पर्याप्त नहीं है। यदि यह सिद्ध किया जा सके कि कोई जाति औरों के मुकाबले सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। क्योंकि अतीत में उनके साथ अन्याय हुआ है, ये मानते हुए उसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर, आरक्षण दिया जा सकता है।
हरियाणा में जाट आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द करते हुए कहा था कि जाति अपने आप में कोई आधार नहीं बन सकती, उसमें दिखाना पड़ेगा कि पूरी जाति ही शैक्षणिक और सामाजिक रूप से बाक़ियों से पिछड़ी है। इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि हम नहीं समझते कि जाट अन्य लोगों से पिछड़े हैं। इसके पीछे तार्किक आंकड़ें होने चाहिए. राजस्थान के मामले में हाई कोर्ट ने गुर्जरों के लिए आरक्षण की मांग के मामले में तार्किक आंकड़ें लाने के लिए कहा था, जिसके लिए एक आयोग भी बना था।
मंडल कमीशन केस में सुप्रीम कोर्ट ने ये साफ कर दिया था कि अलग अलग राज्यों में अलग अलग स्थिति हो सकती है।
मान लें कि किसी पहाड़ी इलाके में मूलभूत सुविधाओं की कमी है तो ये हो सकता है कि वहां पहाड़ियों के लिए 70 फीसदी तक आरक्षण का प्रावधान कर दिया जाए, लेकिन इसे वाजिब ठहराना होगा। 1963 में बाला जी मामले के फ़ैसले को दोहराते हुए इंदिरा साहनी केस में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर 50 फ़ीसदी से ज्यादा आरक्षण नहीं हो सकता क्योंकि एक तरफ हमें मेरिट का ख़्यालल रखना होगा तो दूसरी तरफ हमें सामाजिक न्याय को भी ध्यान में रखना होगा।
लेकिन इसी मामले में जस्टिस जीवन रेड्डी ने ये साफ़ तौर पर कहा है कि विशेष परिस्थिति में स्पष्ट कारण दिखाकर सरकार 50 फ़ीसदी की सीमा रेखा को भी लांघ सकती है। इसी को आधार बनाकर गुजरात में पटेल आरक्षण की मांग कर रहे हैं। महाराष्ट्र में मराठी आरक्षण की मांग लेकर हाल ही में महाराष्ट्र के मुख्य्मंत्री उद्धव ठाकरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपने सहयोगी दलों के प्रतिनिधियों के साथ मांग की है।
2. क्या आरक्षण के कारण देश में मेघावी छात्रों की अनदेखी नहीं की जाती ?
यह सही है कि मेघावी छात्रों की तुलना में आरक्षण कोटे से कम मेधावी छात्रों का चयन किया जाना अनदेखी है। लेकिन देश समग्र विकास के सिद्धांत पर चलता है। समाजवाद यहीं है कि सबका साथ और सबका विकास हो। इसलिए इस कीमत पर कि हमें शोषित वंचित लोंगों के जीवन स्तर को उठाकर समानता लाई जा सके। ऐसा करना ही पड़ेगा। फिर यह आरक्षण तो सिर्फ सरकारी सेवाओं में ही है। मेघावी लोग अन्य क्षेत्रों में अपनी कुशल और बेहतरीन ज्ञान का उपयोग कर देश के विकाश में बेहतर योगदान दें सकते हैं। सामान्य वर्ग के कट ऑफ और आरक्षित वर्ग के कट ऑफ का अंतर लगातार कम हो रहा है।
3. आरक्षण का एक मूल आधार है कि क्योंकि अतीत में उनके साथ अन्याय हुआ है, ये मानते हुए उसकी क्षतिपूर्ति के तौर पर, आरक्षण दिया जा सकता है। क्या यह सही है कि जो अन्याय हमारे पूर्वजों ने किया उसकी सजा वर्तमान पीढ़ी भुगते ?
यह सही है कि किसी एक के जुर्म की सजा किसी दुसरे को नहीं दी जा सकती। तो आरक्षण विरोधी यह तर्क देते हैं कि फिर पूर्वजों द्वारा किया गया अन्याय की सजा बाद की पीढ़ी को देना कहां तक उचित है ? लेकिन इस तर्क का उतर भी इसी तर्क में छिपा हुआ है । चूंकि पूर्वजों ने इन जातियों का शोषण कर जो चल अचल सम्पत्ति अर्जित किया था उसका उपभोग अभी तक उनकी अगली पीढ़ियां कर रही है इसलिए उनके कारनामों का प्रतिफल भी अगली पीढियों को ही भुगतना पड़ेगा। क्योंकि उन्ही के बदौलत आज भी ये ऊंचीजातिकी ये पीढ़ियां सामाजिक आर्थिक तौर पिछड़े वर्ग , अनुसूचित जातियों और जनजातियों पर समृद्ध है।
4. आखिर आरक्षण कब तक दिया जाता रहेगा ?
आरक्षण का प्रावधान करते समय यह सोचा गया था कि एक निश्चित अवधि में आरक्षित वर्ग को आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध किया जा सकेगा। फिर इसकी जरुरत नहीं रह जाएगा। विगत 70 वर्षों से अधिक समय बीत जाने के बाद भी कतिपय कारणों से ऐसा अभी तक हो नहीं पाया है। हां इसमें तेजी से सुधार अवश्य हुआ है। इसलिए आरक्षण की व्यव्स्था तब तक जारी रहेगा जब तक ऐसा हो नहीं जाता। लेकिन अब आरक्षण सामाजिक न्याय से बढ़कर एक राजनीतिक मुद्दा होता जा रहा है जिसके चलते ऐसा लगता है कि शायद ही कोई सरकार इस मुद्दे पर कोई अंतिम निर्णय लें।
5. क्या आरक्षण का आधार आर्थिक होना चाहिए ?
आरक्षण सिर्फ आर्थिक असमनाताओं को दूर करने के लिए नहीं बल्कि सामाजिक न्याय को प्रतिस्थापित करने के उद्देश्य से किया गया है। जिसमे किसी जाति विशेष के पुरे समुदाय समाजिक रूप से समृद्ध किया जा सके। इसलिए आरक्षण को जातिगत आधार पर निर्धारित किया गया है।
6. जब जातिगत आधार पर आरक्षण की व्यव्स्था हो गया है तो आरक्षित वर्ग के लोगों को सामान्य वर्ग में क्यो चुना जाता है।
देश में पिछड़े वर्ग सहित अनूसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों को मिला दिया जाए तो यह कुल जनसंख्या का लगभग 90% है जबकि आरक्षण सिर्फ 49.5% ही है। इसलिए न्याय तभी होगा जब उनका आनुपातिक प्रतिनिधित्व मिले या सक्षम लोगों को सामान्य वर्ग में जगह मिले। चुंकि पहले स्थिति में देश के विकाश पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा इसलिए दुसरी व्यव्स्था की गई है।
वैसे तो निकट भविष्य में इसके आसार नजर नहीं आ रहे है। लेकिन हाल के दिनों में प्रकाशित परीक्षाफलों से यह स्पष्ट होता है कि आरक्षित वर्गों में भी प्रतियोगिता का स्तर बढ़ा है और सामान्य वर्ग के कट ऑफ और आरक्षित वर्ग के कट ऑफ का अंतर लगातार कम हो रहा है। कई ऐसी परीक्षा भी हुईं हैं जिसमें OBC का कटऑफ सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के कट ऑफ से अधिक था। सामान्य वर्ग इस कठिन प्रतियोगिता से खुद को दूर करने लगा है और अन्य विकल्पों की तलाश करने लगा है। इसलिए भविष्य में ऐसा भी हों सकता है कि आरक्षित वर्ग का कट ऑफ समान्य वर्ग के कट ऑफ से ज्यादा हों सकता है। तब यह जातियां आरक्षण के विरोध में खड़ी होंगी तब जाकर आरक्षण धीरे धीरे खत्म हो सकता है।
विसंगतियां एवं सुधार
1. संविधान में आरक्षण का प्रावधान करने के 70 वर्ष से अधिक बीत जाने के बावजूद अभी भी इसकी जरुरत है । ऐसा इसलिए है कि इन जातियों में कुछ वर्ग आर्थिक और सामाजिक रूप से समृद्ध हो गए हैं। वास्तव में अब उन्हें ये आरक्षण मिलना नही चाहिए लेकिन जाति विशेष को आरक्षण होने से यहीं लोग आरक्षित वर्ग की नौकरियों पर कब्जा कर लेते हैं। जबकि जिनको वास्तव में इसकी जरुरत है उनको यह लाभ मिल ही नहीं पाता। इसका परिणाम यह हुआ कि जो लोग दलित वर्ग में दूर दराज इलाकों में 70 वर्ष पहले पिछड़े हुए थे आज भी उनमें से अधिकांश के जीवन स्तर में सुधार बहुत नही हो सका है न ही आरक्षण का लाभ उठा सकें है।
2. सरकार ने क्रीमी लेयर अर्थात् आरक्षण श्रेणी से उन लोगों को बाहर करने का प्रावधान किया जिसकी सालाना आमदानी 8 लाख रुपए से अधिक है। लेकिन यह प्रावधान अभी कागज पर ज्यादा जबकि प्रभाव में कम है। जिससे आरक्षण का फायदा सशक्त लोग इन जातियों का उठा लेते हैं जिससे आरक्षण का जो मकसद है वह पूरा होता दिख नही रहा। इसको थोड़ी सख्ती से पालन करने की जरुरत है।
3. आरक्षण एक भारतीय संविधान द्वारा प्रदत्त एक हकीकत है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। जरुरत है खुद को प्रतिभावान बनाने की जिससे सामान्य वर्ग में होने वाली प्रतिस्पर्धा में कड़ा मुकाबला किया जा सके। उर्दू एवं फारसी के कवि मुहम्मद इकबाल के यह शब्द निसंदेह जोश का संचार करने वाले हैं-
“खुद को कर बुलंद इतना कि हर तकदीर से पहले खुदा बंदे से खुद पूछे बता तेरी रजा क्या है”
नोट : यह मेरे अपने विचार हैं जो निष्पक्ष रहकर तटस्थ भाव से लिखी गई है। हो सकता है कि किसी के विचार किसी एक पक्ष के ज्यादा करीब हो जो स्वाभाविक ही है। ऐसी स्थिति में तर्कपूर्ण परिचर्चा का स्वागत है।
आप अपनी राय कॉमेंट बॉक्स में सुसाजित और अनुशासित शब्दावली में रख सकते हैं।
सादर अभिवादन
अरविंद सिंह





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